घर

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Ghar Recital
बचपन में हमारा एक घर हुआ करता था,
उस घर में यादों का सिलसिला हमेशा ही चलता रहता था,
वहाँ के आंगन की मिट्टी में एक अजीब सें सुकून की महक थी,
उस घर की छत पे घरवालों के साथ कुछ चिड़ियों की भी चहक थी।

वहाँ कमरें कम और लोगों का आवागमन ज़्यादा हुआ करता था,
और कहकशों का कारवां दिन रात चलता रहता था,
हमारी ज़रूरतें उस घर में कभी भी पूरी नहीं होती थी,
पर सारी शिकायतें सपनो के तकियों तले ख़ुशी से सोयीं रहती थी।

तब एक अलग सा सुकून हमारें बीच में रहता था,
अपनो का अपनापन हर दर्द की दवा बन जाता था,
उस घर के हर शक्ष के अपने ही रंगीन अन्दाज़ थे,
उन दिनो की महफ़िलो के भी अपने ही मिज़ाज थे।

उस घर में लोगों की रखवाली ज़्यादा और चीज़ों की थोड़ी 
कम हुआ करती ही थी, 
हर एक ख़ुशी और आसूँ की कड़ी हमेशां दिलों से जुड़ी हुई थी,
उस घर में खाना पीना हमेशा ही चलता ही रहता था, 
और ग़म को भुलाने के लिए बस एक दूसरे का साथ ही
काफ़ी हुआ करता था। 

आजकल के दायरे कुछ अलग ही हो रखें हैं, 
हर एक लम्हे में ज़िंदगी कम और शिक़वे ज़्यादा भरें हुएँ हैं ,
आजकल कमरें बड़े हो गए हैं, लेकिन ज़िंदगी फिर भी तकियों 
के नीचे दबी दबी सी नज़र आती हैं, 
रंज और ग़म की शामों में जब अपनो का साथ नहीं होता तो 
उन दिनो की याद फिर से सताती है।

वक्त के साथ चलते चलते घर के मायने कब बदल गए 
पता ही नहीं चला, 
हम अपनी जीत की ख़ुशियाँ मनाते रहे, और हमारा साथ 
कहीं पीछे ही छूट गया, 
हम इतने दूर निकल गए वो रिश्ते सिर्फ़ बीतें दिनो की धूँधली 
सी तस्वीरों में क़ैद रह गए, 
आज वहीं तस्वीरें जब सामने आई, तो हम पुरानी यादो
में फिर से बह गए।

अब बस एक ही आरज़ू हैं की जिस दिन यह जीवन कि शाम हों, 
और आखें जब बंद होते होते एक आख़री बार फिर से नर्म हो,
तब उसी घर के कमरों में फिर से हम सब एक साथ नज़र आयें,
वही बागों की ख़ुशबू के एहसास में मेरी साँसें फिर से एक़बार थम जायें।

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